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उसने झपटा अपना छोड़ पर पाया नहीं उसे

Sandeep Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उसने झपटा अपना छोड़ पर पाया नहीं उसे
        
                                                    
                            
रखा जरूरत से ज्यादा खा पाया नहीं उसे
रूप उसने अपना असली दिखाया नहीं उसे
जो कुछ भी था उसने सही बताया नहीं उसे
पहले था शुरू खेल उसने सुलझाया नहीं उसे
हुआ जो भी नया पसंद छोड़ पाया नहीं उसे
जो था उसे पसंद गीत गा पाया नहीं उसे
भिड़ा जिस जिस से भी कहीं हराया नहीं उसे
सही में आज तक कुछ पसंद आया नहीं उसे
सोचते हैं उनके मन ने भरमया नहीं उसे
सही रास्ते पर उसने कभी लाया नहीं उसे
उसने आज तक जो ढूंढा सही पाया नहीं उसे
उससे होकर जो गुजरा छोड़ पाया नहीं उसे
अंदाज से उसके कौन ललचाया नहीं उसे
सच तो है की मैं भी समझ पाया नहीं उसे
पर बहकी राग में कभी भी गाया नहीं उसे
छोड़कर कभी जा सकती माया नहीं उसे
हर कोई चिंता में है जो पाया नहीं उसे
किस्मत ने अभी तक जगाया नहीं उसे
सुकूँ अपने इलाके में ढूंढ पाया नहीं उसे
 
4 घंटे पहले
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