उसने झपटा अपना छोड़ पर पाया नहीं उसे
रखा जरूरत से ज्यादा खा पाया नहीं उसे
रूप उसने अपना असली दिखाया नहीं उसे
जो कुछ भी था उसने सही बताया नहीं उसे
पहले था शुरू खेल उसने सुलझाया नहीं उसे
हुआ जो भी नया पसंद छोड़ पाया नहीं उसे
जो था उसे पसंद गीत गा पाया नहीं उसे
भिड़ा जिस जिस से भी कहीं हराया नहीं उसे
सही में आज तक कुछ पसंद आया नहीं उसे
सोचते हैं उनके मन ने भरमया नहीं उसे
सही रास्ते पर उसने कभी लाया नहीं उसे
उसने आज तक जो ढूंढा सही पाया नहीं उसे
उससे होकर जो गुजरा छोड़ पाया नहीं उसे
अंदाज से उसके कौन ललचाया नहीं उसे
सच तो है की मैं भी समझ पाया नहीं उसे
पर बहकी राग में कभी भी गाया नहीं उसे
छोड़कर कभी जा सकती माया नहीं उसे
हर कोई चिंता में है जो पाया नहीं उसे
किस्मत ने अभी तक जगाया नहीं उसे
सुकूँ अपने इलाके में ढूंढ पाया नहीं उसे
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