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औरों के हित कुछ कर जाऊँ

Sandeep Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह पाप पुण्य जो कमा रहा
        
                                                    
                            
मेरा नहीं, औरों के हित सब।
ख़ामोश हूँ इतना आखिर क्यों
यूँ देख के मुझे चकित हैं सब।

दुनिया का खेल अनोखा है,
इस जग में कितना धोखा है।
हमें जिंदगी आजमाती है
और मौत से शर्त लगाती है।

मैं भी जब छोटा बच्चा था
तब दिल-ओ-जान से सच्चा था।
हर शख्स को तब मैं प्यारा था,
पर माँ का बड़ा दुलारा था।

क्या खूब मेरा वो बचपन था
कागज की नाव बनाता था,
फिर जाकर नदी तालाबों में
मैं उन्हें छोड़ के आता था।

कुछ धूल जम गई है उनपे
धुँधली सी कुछ तस्वीरे हैं।
है लुटी हुई तकदीर मेरी,
हाँथों से मिटी लकीरें हैं।

अरमान जगे थे जो दिल में
सब खाक हो गए इक पल में।
खुशियों का ढला सवेरा है,
जिस पल से गम ने घेरा है।

बस सपना मेरा इतना है
कि हँसते हँसते मर जाऊँ।
पहचान बना इस दुनियां में
औरों के हित कुछ कर जाऊँ।।
6 घंटे पहले
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