किसी को याद करने से अगर वो मिल गया होता।।
वज़ह ना पूछता कोई और चेहरा खिल गया होता।
गुज़ारे साथ जो लम्हें उन्हें याद कर इतना रोए है,,
शायद जिंदा होते हम अगर वो मिल गया होता।।
ज़माना लौटकर अपना अब कहाँ आएगा फिर से,,
ना होती आँख ये सहरा गर समंदर मिल गया होता।।
ना मयखाने कहीं होते ना तसव्वुर चाँद का होता,,
अगर इक फ़ूल गुलशन में मेरा भी खिल गया होता।।
उसे ही सोचते गुज़री के कुछ भी कर नहीं पाया,,
मेरा भी नाम होता आज गर पढ़ लिख गया होता।।
चलो अच्छा हुआ मिट गई कहानी अपनी भी यूँही,
सफ़ा खाली ना रह जाता अगर वो मिल गया होता।।
बड़ा आया था क़िस्मत को बदलने तू भी यहाँ देव,,
ख़ुदा ना बन गया होता अगर वो मिल गया होता।।
- सुनील देव