फ़रेब-ए-आगही है यह या फिर है हिर्स-ए-नादानी। जहाँ पर इब्न-ए-आदम पे हर इक पहर निगरानी।
नई ईजाद तो बस चंद लोगों का खिलौना है। मगर ग़ाफ़िल समझता है मिली है उस को आसानी।
जुनून-ए-ख़ुद नुमाई को सजा कर बेचते हैं वो। तमद्दुन के बहाने ख़ल्क़-ए-दुनिया लूटते हैं वो।
मगर ग़ाफ़िल समझता है कि दुनिया पा ली उस ने। ख़सारा है सरासर यह, सकून-ए-जाँ की वीरानी।
घरों के सहन वीरान हैं, हर इक घर में ख़ामोशी। कोई बोले तो किस से, हर तरफ़ छाई है मायूसी।
ख़ुशी अपनों से पहले ग़ैर को शीशे पे दिखला कर। बड़ा कुनबा दिखाते हैं मगर बातिन परेशानी।
सभी गुम सुम से बैठे हैं, ख़ुलूस-ए-दिल नहीं बाक़ी। मिटा डाली है हम ने ख़ुद ही तारीख़-ए-इंसानी।
यह वो इब्लीस-ए-फ़ितरत है, जो पोशीदा राज़ ढूँड लेता है। रहम में क्या निशाँ है, उस का शजरा ढूँड लेता है।
समंदर के अंधियारों से मर्जीना ढूँड लेता है। दबी मिट्टी के अंदर से ज़रीना ढूँड लेता है।
वह तूफ़ानों के आगे से सफ़ीना ढूँड लेता है। जुनून-ए-सरकश-ए-ईजाद ने मचाया है नया फ़ितना!
मगर अफ़सोस! इंसान ता-उम्र ख़ुद को पा नहीं पाता,बनावट की नुमाइश में, रज़ीना ढूँड लेता है?
ख़ुदा से जंग है और इस का हासिल सिर्फ़ वीरानी!
बुना है ख़ुद ही क़फ़स ईंट गारा अक़्ल का साहिर।
सुनाऊँ किस को अब "जावेद" ग़म-ए-इंसान-ए-ज़िंदानी!
सुनाऊँ किस को अब "जावेद" ग़म-ए-इंसान-ए-ज़िंदानी!