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चलते चलते तो थक जाते है मुसाफिर भी

sakshi singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर सफर का मुकाम एक मंजिल हो
        
                                                    
                            
ये जरूरी तो नहीं
कश्तियों का साथी समंदर हो
ये जरूरी तो नहीं
राह तो भूल जाते है राहगीर भी
चलते चलते तो थक जाते है मुसाफिर भी
वो थके यूं ही बैठे रह जाएं
ये जरूरी तो नहीं
जीवन संघर्षों से भरी एक किताब
ये किताब कभी खत्म ही ना हो
ये जरूरी तो नहीं
13 घंटे पहले
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