विज्ञापन

बुद्धत्व

Roli Misra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            --बुद्धत्व--
        
                                                    
                            

आँख में आंसू न होंठों पर हँसी हो,
अपनी दुनिया अपने अन्दर ही बसी हो,
शब्द खो दें ओज जिसकी दीप्ति में,
मौन का संसार ही बुद्धत्व है।

जीत पर क्या दर्प, क्या खोने पे कुण्ठा,
हार की चिन्ता ,न पाने की उत्कंठा,
पर्यटक बन कालखंडों से गुज़रना,
मन का वह सन्यास ही बुद्धत्व है।

बँध के रहना क्या, किसी को बाँधना क्या,
त्याग देना जिसको, उसको माँगना क्या?
फिर भी दुनिया भर को अपना मानना,
घर का ये विस्तार ही बुद्धत्व है।

ज़िन्दगी के बोधिवृक्षों के तले ही,
हो न पाये तथागत मानव भले ही,
अनुभवों की रोशनी में आदमी का,
देव में निर्माण ही बुद्धत्व है।

---- रोली मिश्रा


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

13423 कविताएं

View Profile

Dn Chaubey

7484 कविताएं

View Profile