ब्रह्मांड रचाकर
जगत सजाकर,
लीला करते
लीला पुरुषोत्तम,
नील चक्र का पावन केतु
सदा लहराता धर्मध्वज हेतु,
फिर अन्याय क्यों
होता चुन-चुन ।।१।।
मर्यादित कौन - कहाँ?
है इस धरती पर,
धूर्त चपल की इस नगरी में
ढोल बजाकर
भजन है गाते,
स्वांग रचाकर
नाच-नाचते ।।२।।
भय न लगता
उनको क्षण भी,
राम-रत्न की
लूट है करते,
अन्याय सजाकर
न्याय लूटकर
अश्रु का उपहास
है करते,
सरेआम है हाड़ चबाते ॥३॥
व्यथा दुखी जन की
है कलम यह लिखती,
शब्द नहीं
जो त्रुटि होगी,
है भाव सकल
शोषित पीड़ित के,
आओ बिहारी
निज रूप लिए ||४||
अन्याय न्याय को
पीट रहा
अब न्याय
गुहार लगाता है,
शोषित पीड़ित
बेसुध होकर,
याचक बन अब
तेरे द्वार खड़े ।।५।।
विशाल नेत्र है
चक्र समान
कर दे सबका
पाप हरण,
बिना हाथ के
बिन पाँव के,
तू कर सकता
उपचार सरल ।।६।।