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तमसो माँ ज्योतिर्गमय

Ravi Srivastava

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब उन्हें गीता का पाठ पढ़ाना ज़रूरी है,
        
                                                    
                            
धर्म के रक्षक बन, अधर्म मिटाना ज़रूरी है।
जो मासूम लहू से अपनी तक़दीरें लिखते हैं,
उनके अभिमान का शीश झुकाना ज़रूरी है।

बच्चों के ख़ून से जो अपने भाग्य सँवारते हैं,
मानवता के हर नियम को बार-बार लाँघते हैं।
ऐसे पाप का बोझ धरा भी कब तक ढोएगी?
अब न्याय की ज्वाला हर सीमा को छूएगी।

ये हमें गवारा नहीं, ये भारत की रीति नहीं,
निर्दोषों पर वार करे, ऐसी कोई नीति नहीं।
क्षमा वहीं तक शोभा देती, जहाँ पश्चाताप रहे,
दुष्टता जब सीमा लाँघे, तब रण का प्रताप रहे।

अब तो कृष्ण ने भी सुदर्शन उठा लिया है,
धर्मरथ ने फिर अपना पथ सजा लिया है।
जब-जब अन्याय ने मानवता को ललकारा है,
भारत ने हर बार इतिहास नया सँवारा है।

नवभारत का निर्माण कोई अतिशयोक्ति नहीं,
यह संकल्प है, यह सत्य है, कोई कल्पना नहीं।
जहाँ करुणा भी होगी, पर साहस का मान भी,
जहाँ शांति का दीप जले, पर सुरक्षित प्राण भी।

गीता का यही संदेश युगों-युगों से गूँजता है—
धर्म हेतु जो अडिग रहे, वही अमर कहलाता है।
अन्याय के अंधकार पर सत्य की विजय होगी,
भारत की यह पावन धरती फिर से स्वर्णिम होगी।
- रवि श्रीवास्तवा 
एक महीने पहले
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