विज्ञापन

कैसे खुद कोे संभालूं अब

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            किससे कहूँ ये दिल की हालत,
        
                                                    
                            
जब रास्ते भी नहीं मिलते हैं घर के आगे।

बादल जाने कब से रूठे हैं शहर से,
हर तरफ़ बस नमी-सी ठहरी है आगे,
हम तो निकले थे किसी ख़्वाब की तलाश में,
मगर सैलाब खड़ा मिला घर के आगे।

दिल में भी एक नदी उतर आई है शायद,
जिसका कोई किनारा नहीं मिलता आगे,
कैसे ख़ुद को संभालूँ अब,
जब पानी ही पानी हो गया है घर के आगे।
-रतन कुमार कैथवास
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all