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कैसे खुद कोे संभालूं अब

                
                                                         
                            किससे कहूँ ये दिल की हालत,
                                                                 
                            
जब रास्ते भी नहीं मिलते हैं घर के आगे।

बादल जाने कब से रूठे हैं शहर से,
हर तरफ़ बस नमी-सी ठहरी है आगे,
हम तो निकले थे किसी ख़्वाब की तलाश में,
मगर सैलाब खड़ा मिला घर के आगे।

दिल में भी एक नदी उतर आई है शायद,
जिसका कोई किनारा नहीं मिलता आगे,
कैसे ख़ुद को संभालूँ अब,
जब पानी ही पानी हो गया है घर के आगे।
-रतन कुमार कैथवास
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48 मिनट पहले

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