हथेली को काँपते देखा है
बाँहों को तरसते देखा है
चेहरे को सूखते देखा है
आँखों को बरसते देखा है
मत पूछो मेरी इन आँखों ने
क्या-क्या मंज़र देखे हैं
जाड़े के ख़्वाब को जेठ की
दुपहरी में झुलसते देखा है
सुनते हैं गूँजते सन्नाटे
ख़ामोशी से बातें करते हैं
रखते हैं यारी उदासी से
तन्हाई को बाँहों में भरते हैं
मेरे जीने की दुश्वारी
बस मेरा अन्तर जाने है
हम किन्हें देखकर जीते हैं
हम किन बातों पे मरते हैं
कुछ ख़्वाब बड़े चमकीले हैं
कुछ अरमाँ बेहद सादे हैं
हैं ख़ाली नहीं जेबें अपनी
कुछ क़समें हैं कुछ वादे हैं
कुछ मसले जाकर सुलझे हैं
कुछ हैं जो अभी भी उलझे हैं
छूटने की ख़्वाहिश है कहीं
कहीं जुड़ जाने के इरादे हैं
हमें क्या पाकर हँस लेना है
क्या खोकर हमको रोना है
रखना है काँधे पे किसके सर
किसकी बाँहों में सोना है
कट जानी यूँ ही उमर कहीं
है थम जाना सफ़र कहीं
वक़्त की उंगली थामे हुए
देखे जायें जो होना है
~ रक्षित मिश्रा