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महादेवी वर्मा: बादलों के पार से यथार्थ की ज़मीन तक

साहित्य
                
                                                         
                            आधुनिक हिंदी साहित्य के परिदृश्य में बीसवीं शताब्दी का पूर्वार्ध एक अभूतपूर्व वैचारिक और कलात्मक क्रांति का साक्षी रहा है, जिसे साहित्य के इतिहास में 'छायावाद' के नाम से जाना जाता है। छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में महादेवी जी का स्थान विशिष्ट और अद्वितीय है। महादेवी वर्मा के साहित्य में मानवीय संवेदना, अतींद्रिय रहस्यवाद, और बौद्ध दर्शन से प्रेरित करुणा का अगाध सागर हिलोरें लेता है। साहित्येतिहासकारों का यह सर्वमान्य निष्कर्ष है कि छायावाद के स्वरूप में 'प्राण-प्रतिष्ठा' करने का गौरव महादेवी वर्मा को ही प्राप्त है। 
                                                                 
                            

महादेवी वर्मा के काव्य का मूल स्वर 'वेदना' और 'विरह' है। किंतु यह वेदना किसी लौकिक हताशा, अवसाद या पलायनवाद का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक उदात्त दार्शनिक परिणति है। उन्हें हिंदी साहित्य में 'आधुनिक मीरा' की अत्यंत सार्थक संज्ञा दी गई है।  उनके काव्य में वेदना कोई क्षणिक या नकारात्मक भाव नहीं है; यह एक रचनात्मक और चिरस्थायी ऊर्जा है। सुमित्रानंदन पंत ने महादेवी की विरह वंदना पर सटीक टिप्पणी करते हुए उन्हें 'वेदना की साम्राज्ञी' कहा है। पंत जी के अनुसार, महादेवी को सुख नहीं चाहिए क्योंकि सुख क्षणिक है और आत्म-विस्मृति (तन्मयता) लाता है, जबकि वेदना चिरस्थायी, चिरव्यापी और मनुष्य को उसकी चेतना के उच्चतम स्तर पर ले जाने वाली है। यह वेदना मौन, नीरव तथा एकाकी है, इसलिए वह असीम ओजस एवं अविरल है। 


बौद्ध दर्शन के 'दुःखवाद' और 'करुणा' का उन पर गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है। भगवान बुद्ध का 'सब्बम दुक्खं' (सर्वत्र दुःख है) उनके यहाँ घोर निराशा नहीं पैदा करता, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के प्रति एक रागात्मक करुणा और सहानुभूति को जन्म देता है। उन्होंने स्वयं भारतीय दर्शन को आत्मसात करते हुए गीतों का ऐसा समृद्ध भंडार साहित्य को सौंपा है, जहाँ वे वैयक्तिक सुख को विश्व वेदना में घोलकर अपने जीवन को सार्थक मानती हैं और वैयक्तिक दुःख को विश्व सुख में घोलकर जीवन को अमरत्व प्रदान करना चाहती हैं। 

उनका सर्वोत्कृष्ट काव्य-संग्रह 'यामा' (जिसके लिए उन्हें 1982 में साहित्य के सर्वोच्च सम्मान 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से सम्मानित किया गया) उनके चार प्रारंभिक काव्य-संग्रहों,  'नीहार' (1930), 'रश्मि' (1932), 'नीरजा' (1933), और 'सांध्यगीत' (1935) का संकलन है।

इन संकलनों के माध्यम से महादेवी जी की विरहानुभूति और आध्यात्मिक यात्रा का क्रमिक विकास देखा जा सकता है। इन संकलनों में महादेवी जी की अनुभूति क्रमशः वैयक्तिक से समष्टिगत होती जाती है। उनकी अत्यंत प्रसिद्ध पंक्ति, "विस्तृत नभ का कोई कोना मेरा न कभी अपना होना," केवल आध्यात्मिक रिक्तता का प्रलाप नहीं है, बल्कि एक स्त्री के रूप में विशाल पितृसत्तात्मक समाज में अपनी हिस्सेदारी के अभाव का  एक प्रच्छन्न आख्यान है। 


आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे रसवादी और कठोर आलोचक ने भी मुक्त कंठ से यह स्वीकार किया है कि छायावादी कवियों के अंतर्गत एकमात्र महादेवी वर्मा जी ही सच्ची रहस्यवादी मानी जा सकती हैं। महादेवी जी का रहस्यवाद कबीर के ज्ञानमार्गी रहस्यवाद या जायसी के प्रेममार्गी सूफी रहस्यवाद का आधुनिक, परिष्कृत और वैयक्तिक संस्करण है। उनकी रहस्यवादी चेतना में किसी बाह्य कर्मकांड या उपास्य उपकरण की आवश्यकता नहीं है। उनका अपना शरीर, अपना जीवन और उनकी अपनी श्वासें ही उस अज्ञात प्रीतम की आराधना के साधन हैं। वे लिखती हैं:

"क्या पूजा क्या अर्चन रे / उस असीम का सुंदर मंदिर मेरे लघुत्तम जीवन रे" 

जब असीम से लघु सीमा का मेल होता है, तो महादेवी लिखती हैं कि "अमरता खेलेगी मिटने का खेल," जो उनके आत्मदान की महायात्रा की पूर्णता को दर्शाता है।  आगे पढ़ें

उनके साहित्यिक अवदान का सबसे विस्मयकारी और क्रांतिकारी पहलू उनका गद्य साहित्य है

5 महीने पहले

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