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यह जो नफरत का अलाव सुलग रहा है

Rakesh Vaidya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यहाँ हर आदमी
        
                                                    
                            
एक फटे हुए लिफाफे की तरह है
जिसके भीतर
धर्म की कोई पुरानी पर्ची पड़ी है।
सड़क पर खून बह रहा है
और संसद में
कुछ लोग वोटों की गिनती का
अबेकस हिला रहे हैं।

सुनो!
यह जो भगवान के नाम पर
तुम्हारे हाथों में पत्थर थमाए गए हैं
ये तुम्हारी तकदीर के नहीं,
तुम्हारे ही घरों के चिराग बुझाने के औजार हैं।

रोटी की बात करो,
दवा की बात करो,
रोजगार के फटे हुए आसमान को
सिलने की बात करो—

यह जो नफरत का अलाव सुलग रहा है
इसमें सबसे पहले
तुम्हारा ही घर, तुम्हारी ही चूल्हें की आग
और तुम्हारी ही राख बचेगी।
 
एक घंटा पहले
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