दुःख का कारण
जीवन में दुःख का कारण,
अक्सर परिस्थितियाँ नहीं होतीं,
हमारी अपनी इच्छाएँ
और उनसे जुड़ी आसक्तियाँ होती हैं।
जिसे पाने की चाह बढ़ती जाती है,
उसके खोने का डर भी बढ़ता है,
और मन जितना किसी से बंधता है,
उतना ही बिछड़ने पर टूटता है।
इच्छाएँ पूरी हों तो सुख मिलता है,
अधूरी रहें तो मन रोता है,
हम बाहर कारण खोजते रहते हैं,
जबकि दुःख भीतर ही जन्म लेता है।
जिस दिन चाह कम हो जाएगी,
और आसक्ति ढीली पड़ जाएगी,
उसी दिन समझ आएगा—
शांति कहीं बाहर नहीं,
हमारे अपने भीतर ही थी।
-रजनी