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उदासी के आलम में

RAJ KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उदासी के आलम में
        
                                                    
                            
जब भी ख़यालों के घने जंगल में
गुम हो जाता हूँ,
बैठ जाता हूँ
खिड़की के पास ख़ामोशी से।
तभी बहती ठंडी हवा
आकर अपने मर्मस्पर्शी हाथों से
सारी परेशानियों को
ओझल कर देती है,
और
फिर चुपके से कान में
एक अनाम राग गुनगुनाती है—
ज़िंदगी ठहरे हुए
पानी की तरंगे नहीं,
बस एक अविरल
बहती सरिता का नाम है।
एक घंटा पहले
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विजय कुमार

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