उदासी के आलम में
जब भी ख़यालों के घने जंगल में
गुम हो जाता हूँ,
बैठ जाता हूँ
खिड़की के पास ख़ामोशी से।
तभी बहती ठंडी हवा
आकर अपने मर्मस्पर्शी हाथों से
सारी परेशानियों को
ओझल कर देती है,
और
फिर चुपके से कान में
एक अनाम राग गुनगुनाती है—
ज़िंदगी ठहरे हुए
पानी की तरंगे नहीं,
बस एक अविरल
बहती सरिता का नाम है।
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