क्या सोच के फासला आप मुझसे बढ़ाने लगे राह ए तलब बढ़ा कर हौसला हमें बार बार आप आजमाने लगे हैं
दिल है कि मानता नहीं करके कोशिश तमाम वफा राह ए मिटा के हस्ती फिर भी उम्मीद आपसे लगाने लगे हैं
सहूं कब तक अंदाज़ ए बेरुखी आपका निभा कर रस्म ए वफा आपसे जान के अब अंजाम हम घबराने लगे हैं
पूछ कर हाल ए गम मेरा गर खुश हो तो ये खुशी आपकी करके कोशिश तमाम जश्न ए बर्बादी हम मनाने लगे हैं
जाओ चिराग़ कहीं और मत खेलो अठखेलियां मुझसे जान कर अब गैर तुम्हें होकर मायूस दर्द हम बढ़ाने लगे हैं