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मिजाज़ ए बेरुखी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आकर बिखरती तमन्नाओं में भंवर में गुज़रा ज़माना भूल जाना पड़ा दिल है कि मानता नहीं बेचैन दिल को मनाना पड़ा
        
                                                    
                            
करके शिकवा चिरागों से हर बार मिला कब चैन ओ सकूं किसी को लगा कर गोते गम के दरिया में तमन्ना मिटाना पड़ा
कर ना सके तुम ऐतबार कभी वफाओं पर ये दर्द हमें बहुत बढ़ा कर अब फासला तुमसे ही मजबूरियां हमें बढ़ाना पड़ा
अंजाम ए वादा ए उल्फत हुआ कब मुताबिक मेरे बहा के आंसू बार बार खुशियां सारी अपनी ही हमें भुल जाना पड़ा
भीड़ में समझ कर रहबर तुम्हें बताया किस्सा ए गम सारा हमने तुमसे बिछड़ने से पहले ही माहौल ऐसा बनाना पड़ा
2 घंटे पहले
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Ankit Kumar

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