आकर बिखरती तमन्नाओं में भंवर में गुज़रा ज़माना भूल जाना पड़ा दिल है कि मानता नहीं बेचैन दिल को मनाना पड़ा
करके शिकवा चिरागों से हर बार मिला कब चैन ओ सकूं किसी को लगा कर गोते गम के दरिया में तमन्ना मिटाना पड़ा
कर ना सके तुम ऐतबार कभी वफाओं पर ये दर्द हमें बहुत बढ़ा कर अब फासला तुमसे ही मजबूरियां हमें बढ़ाना पड़ा
अंजाम ए वादा ए उल्फत हुआ कब मुताबिक मेरे बहा के आंसू बार बार खुशियां सारी अपनी ही हमें भुल जाना पड़ा
भीड़ में समझ कर रहबर तुम्हें बताया किस्सा ए गम सारा हमने तुमसे बिछड़ने से पहले ही माहौल ऐसा बनाना पड़ा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X