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फसाना ए बेचैन तमन्ना

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बढ़ा दिया है बेकरारी मेरी तुमने ही बार बार फिर भी तो होकर मायूस जिंदगी से हमने भी कभी हार कहां मानी
        
                                                    
                            
ये वो जमाना है जहां कद्र इंसानियत की कुछ नहीं सुन के अब तुमसे ताने हजार राह ए वफा भी हार कहां मानी
देकर हमें तुम ठोकरें बार बार किया मजबूर भी बहुत सह कर जुल्म ओ सितम बेशुमार तेरा मैने हार कहां मानी
अब हर हर शाम बढ़ा कर बेरुखी अंदाज़ आप बदलने लगे हैं देकर दुहाई वफा की फिर भी मैने हार कहां मानी
मिल कर तुमसे इस बार अंदाज़ अपना अब बदलना पड़ा चल कर कांटों के राह पर फिर भी मैने हर कहां माना
18 घंटे पहले
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