बढ़ा दिया है बेकरारी मेरी तुमने ही बार बार फिर भी तो होकर मायूस जिंदगी से हमने भी कभी हार कहां मानी
ये वो जमाना है जहां कद्र इंसानियत की कुछ नहीं सुन के अब तुमसे ताने हजार राह ए वफा भी हार कहां मानी
देकर हमें तुम ठोकरें बार बार किया मजबूर भी बहुत सह कर जुल्म ओ सितम बेशुमार तेरा मैने हार कहां मानी
अब हर हर शाम बढ़ा कर बेरुखी अंदाज़ आप बदलने लगे हैं देकर दुहाई वफा की फिर भी मैने हार कहां मानी
मिल कर तुमसे इस बार अंदाज़ अपना अब बदलना पड़ा चल कर कांटों के राह पर फिर भी मैने हर कहां माना
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