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फसाना ए अंदाज़ ए बेरुखी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गर मुसीबत बढ़ाना है तो करके अजीब फैसला अंजाम जो भी हो बगैर सोचे समझे खुशियां अपनी मिटाना है
        
                                                    
                            
मिले ना तुम तो कोई बात नहीं चल कर कांटों की राह पर होगा जो देखा जायेगा सोच कर फासला बढ़ाना है
समझ के अंदाज़ ए बेरुखी अब तो सच कहना जरूरी है करके कोशिश तमाम मिजाज़ आपका भी जानना है
लिखा जब रोना ही रोना नसीब तो क्या करूं दिखा के सच्चाई अपनी ही फर्क सच ओ झूठ अब समझाना है
मिल कर तुमसे जब हुए जुदा तो चैन ओ सकूं खोना भी पड़ा हैं राह ए वफा आजमा के तुम्हें अंजाम जानना है
4 घंटे पहले
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