गर मुसीबत बढ़ाना है तो करके अजीब फैसला अंजाम जो भी हो बगैर सोचे समझे खुशियां अपनी मिटाना है
मिले ना तुम तो कोई बात नहीं चल कर कांटों की राह पर होगा जो देखा जायेगा सोच कर फासला बढ़ाना है
समझ के अंदाज़ ए बेरुखी अब तो सच कहना जरूरी है करके कोशिश तमाम मिजाज़ आपका भी जानना है
लिखा जब रोना ही रोना नसीब तो क्या करूं दिखा के सच्चाई अपनी ही फर्क सच ओ झूठ अब समझाना है
मिल कर तुमसे जब हुए जुदा तो चैन ओ सकूं खोना भी पड़ा हैं राह ए वफा आजमा के तुम्हें अंजाम जानना है
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