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अंजाम ए फसाना ए बेखुदी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आया जो झोंका वक्त का ख्वाब सारे मेरे उड़ा ले गया कयामत ये तेरे दर से उठा के ले गया ये सच हमें सोचना पड़ा
        
                                                    
                            
था मिजाज़ वक्त का भी अजीब कितना सोचना पड़ा हमें जी के गम ए दौर में किसी तरह चिराग ए दिल बुझाना पड़ा
मिलती है जिंदगी चैन ओ सकूं की बड़े नसीब से और जला कर दिल मेरा बार बार आजमाया जा रहा ये सोचना पड़ा
हुआ कब तुम्हें एहतराम मुझ पे समझ ना पाया अभी तक लगा के इल्जाम सताया हमें क्यूं जा रहा है दर्द कहना पड़ा
गर नहीं कोई वादा तो सिर्फ इक हादसा ही दे जाओ निभा कर वफा शिद्दत से फिर भी कांटों पर बार बार चलना पड़ा
एक घंटा पहले
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