आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अंजाम ए फसाना ए बेखुदी

                
                                                         
                            आया जो झोंका वक्त का ख्वाब सारे मेरे उड़ा ले गया कयामत ये तेरे दर से उठा के ले गया ये सच हमें सोचना पड़ा
                                                                 
                            
था मिजाज़ वक्त का भी अजीब कितना सोचना पड़ा हमें जी के गम ए दौर में किसी तरह चिराग ए दिल बुझाना पड़ा
मिलती है जिंदगी चैन ओ सकूं की बड़े नसीब से और जला कर दिल मेरा बार बार आजमाया जा रहा ये सोचना पड़ा
हुआ कब तुम्हें एहतराम मुझ पे समझ ना पाया अभी तक लगा के इल्जाम सताया हमें क्यूं जा रहा है दर्द कहना पड़ा
गर नहीं कोई वादा तो सिर्फ इक हादसा ही दे जाओ निभा कर वफा शिद्दत से फिर भी कांटों पर बार बार चलना पड़ा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
46 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर