जो हुआ सो हुआ तू क्यूं अब रोता है...
क्या तारों के टूट जाने से , आसमान वजूद खोता है...
लग रहा यदि झेल ली बहुत यातना...
तो तू अभी इनसे अछूता है...
जो हुआ सो हुआ तू क्यूं रोता है...
दर पर आने वालों का दिल खोल सम्मान किया...
हिम्मत भर साथ रहा रहमत भर प्यार दिया...
ताड़ सा ऊँचा नहीं , तू तो वट वृक्ष सा विशाल है ...
तुझसे मुँह मोड़ जाने वाला , खुद ही अपनी छाया खोता है...
जो हुआ सो हुआ तू क्यूं रोता है...
जरूरी तो नहीं हर दिन खूबसूरत हो ...
बिखरा मन तो बारिश में भी रोता है ...
अब बांध हौसला आगे चल ...
कर परिश्रम चुन संघर्ष के मोती ...
तू कण-कण इनकी माला पिरोता है ...
जो हुआ सो हुआ तू क्यूं रोता है ।
- प्रवीण यादव
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