आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जो हुआ सो हुआ

                
                                                         
                            जो हुआ सो हुआ तू क्यूं अब रोता है...
                                                                 
                            
क्या तारों के टूट जाने से , आसमान वजूद खोता है...
लग रहा यदि झेल ली बहुत यातना...
तो तू अभी इनसे अछूता है...
जो हुआ सो हुआ तू क्यूं रोता है...

दर पर आने वालों का दिल खोल सम्मान किया...
हिम्मत भर साथ रहा रहमत भर प्यार दिया...
ताड़ सा ऊँचा नहीं , तू तो वट वृक्ष सा विशाल है ...
तुझसे मुँह मोड़ जाने वाला , खुद ही अपनी छाया खोता है...
जो हुआ सो हुआ तू क्यूं रोता है...

जरूरी तो नहीं हर दिन खूबसूरत हो ...
बिखरा मन तो बारिश में भी रोता है ...
अब बांध हौसला आगे चल ...
कर परिश्रम चुन संघर्ष के मोती ...
तू कण-कण इनकी माला पिरोता है ...
जो हुआ सो हुआ तू क्यूं रोता है ।

- प्रवीण यादव

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर