विज्ञापन

जमाना भी बेवकूफ हैं हमें आज पता चला था।।

Praveen Roy

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चेहरे की मुस्कान दर्द छिपाने की कोशिश करता रहा
        
                                                    
                            
आँखों को शायद गुमान न था, वो बयाँ करता रहा ।
गीत लबों पर बेइंतहा शिरकत करता रहा
दर्द अश्क बनकर आंखों से शैलाब उगलता रह।।

अपना दर्द सुनाने की लोगों ने बहुत सलाह दी
मगर सुनने के गलतियां बहुत कम लोगों ने की।
उन चंद लोगों ने ही और तमाशा बना दिया
मेरा दुखड़ा सुनकर मुझे और भी बेआबरू कर गया।।

किसी फ़क़ीर से सुना था कि रोने से दुख कम होता है
मगर पता ना था कि रोने वाले को और रुलाया जाता है।
हंसने की कोई वजह न थी ,रोने का कोई इल्म न था
सरे आम अपना दर्द बयां करने का दंश ताउम्र झेला था।।

झुकना मेरी फितरत थी ,झुकना जमाने की चाहत थी
ये बात मेरी समझ के परे थी, यही मेरी बड़ी गलती थी।
जमाने को समझने में कई अर्से बीत गए
जिंदगी थक कर अपने आखिरी पड़ाव पर खड़ी हो गईं।।

हंसते हुए चेहरे की चाहत सभी को थी
बेशक असलियत किसी को भी पता न था।
हम तो बेवकूफ एक जमाने से थे
जमाना भी बेवकूफ हैं हमें आज पता चला था।।
3 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Pandey

461 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10782 कविताएं

View Profile