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जमाना भी बेवकूफ हैं हमें आज पता चला था।।

                
                                                         
                            चेहरे की मुस्कान दर्द छिपाने की कोशिश करता रहा
                                                                 
                            
आँखों को शायद गुमान न था, वो बयाँ करता रहा ।
गीत लबों पर बेइंतहा शिरकत करता रहा
दर्द अश्क बनकर आंखों से शैलाब उगलता रह।।

अपना दर्द सुनाने की लोगों ने बहुत सलाह दी
मगर सुनने के गलतियां बहुत कम लोगों ने की।
उन चंद लोगों ने ही और तमाशा बना दिया
मेरा दुखड़ा सुनकर मुझे और भी बेआबरू कर गया।।

किसी फ़क़ीर से सुना था कि रोने से दुख कम होता है
मगर पता ना था कि रोने वाले को और रुलाया जाता है।
हंसने की कोई वजह न थी ,रोने का कोई इल्म न था
सरे आम अपना दर्द बयां करने का दंश ताउम्र झेला था।।

झुकना मेरी फितरत थी ,झुकना जमाने की चाहत थी
ये बात मेरी समझ के परे थी, यही मेरी बड़ी गलती थी।
जमाने को समझने में कई अर्से बीत गए
जिंदगी थक कर अपने आखिरी पड़ाव पर खड़ी हो गईं।।

हंसते हुए चेहरे की चाहत सभी को थी
बेशक असलियत किसी को भी पता न था।
हम तो बेवकूफ एक जमाने से थे
जमाना भी बेवकूफ हैं हमें आज पता चला था।।
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49 मिनट पहले

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