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कोरोना

Prakriti Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जन्म तेरा चीन से हुआ
        
                                                    
                            
पालन-पोषण दुनिया से
एक इंशान से दूसरे इंशान में,
फैलकर तू के अपना घर बसाया;
दूसरों की जान लेकर,
तूने अपना पेट पचाया।

तू,तो बाहर खूब घूमा
हम सब को घर बैठाकर
तू,तो बहुत जोर-जोर से हँसा
हम सब को बहुत रुलाकर।

तूने,तो अपना नाम कोरोना बताया
पर,लोगों ने कहा यह वक़्त महामारी का आया
तूने,कहा मैं तुम्हारी जिंदगी बदल दूंगा
मुँह में मास्क,
और हाथ में सैनिटाइजर रख दूंगा।

तुम सब में आपस में बहुत भेद-भाव हैं,
ऊँच-नीच,जात-पात ऐ आपसी का सुझाव हैं;
लो,तो ऐसा वक़्त लाया हूँ
न रहेगी ऊँच-नीच और जात-पात
और न ही रहोगे तुम आपस में साथ-साथ।

कोरोना का सब जगह रोना है,
इसके पीछे खर्च हुआ सोना है
पैसे खर्च हुए लाख और करोड़
पर वैक्सीन न आई
साल पूरा हो को आया
बस ईश्वर की कृपा रंग लाई।

स्कूल पूरे साल बंद रहा
बच्चे घर में बोर हो गए
स्कूल चालू करो,यह सब जगह शोर मच गए
कोरोना ने कहा;बच्चों थोड़ा आराम कर लो
स्कूल चालू होंगे,परीक्षा का इंतजार कर लो।

बस बहुत हुआ यह अत्याचार
कब ख़त्म होगा यह कोरोना का वार
काढ़ा पी-पी के हमने अपनी प्यास बुझाई
मास्क लगा के हमने अपनी जान बचाई
कब आएगी वैक्सीन
यह सवाल हम पूछते हैं डॉक्टर से
आँखें तरस गई वैक्सीन देखने के लिए,
कान तरस गए यह सुनने के लिए
कि फाइनली वैक्सीन आ गई
इंतजार ख़त्म नहीं हो रहा
कोरोना रुकने का नाम नहीं ले रहा
हे ईश्वर आपसे यह प्राथना है
हमे चीन का यह बिन बुलाया मेहमान नहीं चाहिए
ईश्वर जहाँ से यह आया
इसे अपने घर वापिस बुलाए।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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