मन के धनुष का कमान खोता जा रहा
न जाने क्यूं इतना परेशान होता जा रहा
न कोई आरजू न तकल्लुफ न शिकायत कोई
मन मेरा मसान होता जा रहा
न आ रही नींद न ख्वाब अच्छे लग रहे
मुझे सभी सच्चे अब झूठे लग रहे
जैसे मानो हर बात का प्रमाण मांगना चाह रहा
मन मेरा मसान होता जा रहा
दुनिया भर के छलावे मुझे भा नहीं रहे
न अन्न चाह रहा न प्यास मेरी बुझ रही
मन जैसे विचारों खदान होता जा रहा
मन मेरा मसान होता जा रहा
किसी ने चिंगारी लगा दी हो जैसे
और एक तेज झोंका इसे चला रहा
न जाने मेरा ध्यान कहां जा रहा
मन मेरा मसान होता जा रहा
-प्रज्ञा