अरे काहे का डर लगता है,
विद्रोही ही निडर लगता है.
खूब घूम ले दिल्ली-विल्ली,
अपना घर ही घर लगता है.
मौत की घंटी बज उठती है,
चींटी को जब पर लगता है.
महक उठते हैं बाग-बगीचे,
मिट्टी से जब जड़ लगता है.
जब किस्मत तेरे साथ नहीं,
उड़ के भी कंकड़ लगता है.
तन-मन बेचैन हो उठता है,
जो पीठ पे खंजर लगता है.
- प्रदीप विद्रोही