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मैं दिल्ली हूं

Pradeep Rawat

Mere Alfaz
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                            मैं दिल्ली हूं,,
        
                                                    
                            
आजादी के बाद दिल्ली हूं।

अपने सफर की कहानी आज तुम्हें बताऊंगी,
कभी खुशी कभी गम के पल तुम्हें सुनाऊंगी।।
आजादी के बाद का पहले दशक का दौर था,
चारों तरफ खुशी का महौल था।
मुझे सजाने और सवारने की नीतियां बनाई जा रही थी,
मैं हिन्दुस्तान का दिल बनूं ऐसी योजनाएं चलाई जा रही थी।
नेहरू, पटेल, शास्त्री जी के हाथों में मेरी कमान थी,
मुझे विकास के पथ पर दौड़ाएंगे ये उनकी जबान थी।
राजनेता बदले तो राजनीति बदलने लगी,
अब मेरी किस्मत इंदिरा के हाथों से चलने लगी।

अभी मैने विकास का चंद फासला ही तय किया था,
कि नेताओं पर सता का नशा छा गया।
मेरे हितों को छोड़कर कुर्सी का मोह आ गया।

कैसे भूल जाऊं उस दौर को,
जब मुझे इमर्जंसी में कैद किया गया था।
कैसे भूल जाऊं उस दौर को,
जब नागरिक समाज के बोलने पर प्रतिबंध लगा दिया था।

लोकतंत्र अधमरा लहुलुहान पड़ा था इंदिरा के हाथों से,
मेरा दामन भीग रहा था संविधान के आंसूओं से।
जेपी के अन्दोलन से मेरी धरती पर नई क्रांति आई थी,
सिंहासन खाली करों, जनता आती है के नारों से नयी जागृती आयी थी।
जनता जागृति ही मुझे कुछ दिन दिए थे ख़ुशी के पल,
उज्जवल नजर आ रहा था मुझे मेरा आने वाला कल।।

अभी मै थोड़ी सम्भली थी कि,
चौरासी के दंगों से दहल गई,
देखते-देखते हिंसा की आग चारों तरफ फैल गई।
कई लोगों के सिर इस दौर में कलम किये गए,
मेरे आंचल पर कभी न मिटने वाले दाग दिए गए।
हमेशा टूटना मेरे नसीब में लिखा है,
पर टूटकर संभलना मैंने भी सीखा है।।

सन दो हजार में पहली बार मैने बम धमाकों को झेला था,
मुंबई के बाद दहशत गर्दो ने मेरी छाती पर मौत का खेल खेला था।
इसके बाद तो यह सिलसिला बदस्तूर यूं ही चलता रहा,
किसी न किसी का अपना-पराया इन धमाकों मे मरता रहा।
आखिर कब तक मै इस दर्द को सहती रहूंगी,
तुमसे अपने दर्द की दास्तां को यूं कहती रहूंगी।।

ब्लू लाइन के नीचे मरती जिंदगियों को मैने देखा है,
फुटपाथ पर पलती जिंदगियों को भी मैने देखा है।
सड़क के चौराहे पर ढलते बुढापे को मैने देखा है,
कचरे और प्लास्टिक से पेट भरते गाय को मैने देखा है।
तंदूर में इंसानियत को भी जलते हुए मैने देखा है।
यमुना को मल के नालों से गंदा होते हुए मैने देखा है,

मेरी लज्जो डरने लगी है अपनों के बीच मे,
कहां मै उसे छुपाऊं,
अपना दर्द मुझसे वह कहती है,
कैसे मै उसे बचाऊं।
वह सिसकती है, मैं बेचैन हो जाती हूं।

मुझसे अपने ही लोग क्यो इतना नफरत करते हैं,
मेरे सुंदर आंचल को क्यों गंदा करते है।
तुम तो आओगे जाओगे,
मुझे तो यही रहना हैं,
ऐसे कई घावों को सदियों तक सहना हैं।

मुझसे तुम आज एक वादा कर लो,
कम नही ज्यादा कर लो।
तुम सुधर जाओगे तो सारी दिल्ली सुधर जाएगी,
देखते ही देखते सारी दिल्ली बदल जाएगी।
मैं दिल्ली हूं,,
आजादी के बाद दिल्ली हूं।

-प्रदीप रावत "खुदेड़"

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