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जमघट में तन्हा आदमी

pradeep kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जमघट में तन्हा आदमी
        
                                                    
                            

सूनी-सूनी सी गलियाँ, शरारतें नहीं पनघट में,
मरती संवेदनाएँ, आँख में आँसू नहीं मरघट में।।

साफ़ दिखता है सिकन, माथे की हर सिलवट में,
आपाधापी से परेशान, बेचैन नींद की करवट में।।

गुज़रता है सारा दिन भागदौड़ और खटपट में,
स्वयं को ही तलाशता तन्हा आदमी जमघट में।।

दर्पण में निहारता अक्स, चेहरों के जंगल में,
शिखर से भी संतुष्ट नहीं, ख्वाहिशों के दंगल में।।

रिश्ते भी अब सिमट गए हैं मतलब की चौखट में, अपनापन ढूँढ़ता फिरता मन, रिश्तों की आहट में।।

हँसी अधरों पर रहती, पीड़ा छिपी है घूँघट में,
भीतर उठते तूफ़ान दबे, मन की गहरी घूटन में।।

बाहर उजालों का मेला, भीतर गहन अँधेरा है,
हर चेहरा यहाँ मुसाफ़िर, हर इक मन बसेरा है।।

जिसने जीता जग सारा, खुद से वही अकेला है,
यूँ कहने को तो दुनिया में रिश्तों का बड़ा रेला है।।

कब ठहरेगा मन थोड़ा, कब टूटेगा यह भ्रम-जाल,
कब सुनेगा भीतर की आवाज़ , कब करेगा खुद से सवाल?

- प्रदीप सोनसर्व

 
एक घंटा पहले
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