बेला सिर्फ़ एक नाम नहीं,
मेरे घर की धड़कन है,
उसकी मासूम आँखों में
मेरी दुनिया की मुस्कान है।
इंसानों के रिश्तों में भी
प्यार के कई खूबसूरत रंग हैं,
कहीं शब्द हैं, कहीं वादे हैं,
कहीं अपनेपन के संग हैं।
पर बेला का प्यार अलग है—
न कोई वादा, न कोई शर्त,
न बीते कल की कोई शिकायत,
न आने वाले कल की फ़िक्र।
मैं जैसा हूँ, जहाँ हूँ,
वो मुझे वैसे ही अपनाती है,
मेरी ख़ुशी में पूँछ हिलाती,
मेरी उदासी में पास बैठ जाती है।
उसे मेरे पास होने के लिए
किसी वजह की ज़रूरत नहीं,
मेरी मौजूदगी ही उसके लिए
शायद दुनिया की सबसे बड़ी खुशी है कहीं।
वो बोल नहीं सकती,
फिर भी कितना कुछ कह जाती है,
अपनी दो मासूम आँखों से
दिल की हर बात पढ़ जाती है।
कभी-कभी लगता है,
हम इंसान प्यार को शब्दों में ढूँढ़ते रह जाते हैं,
और बेला जैसे नन्हे साथी
उसे अपनी मौजूदगी से समझा जाते हैं।
उसने मुझे सिखाया—
प्यार हमेशा कहा नहीं जाता,
कभी किसी का पास बैठ जाना,
चुपचाप साथ निभाना,
और बिना किसी स्वार्थ के
हर दिन अपना होना जताना भी प्यार है।
शायद इसलिए बेला
मेरे लिए सिर्फ़ एक पालतू नहीं,
एक ऐसा रिश्ता है
जिसमें कोई हिसाब नहीं,
कोई शर्त नहीं—
बस अपनापन है।
और जब कभी ज़िंदगी
बहुत शोर करने लगती है,
बेला मेरे पास आकर
चुपचाप बैठ जाती है…
तब लगता है,
दुनिया में प्यार की सबसे सच्ची भाषा
शायद शब्द नहीं—
साथ होना है।