मैं खुद से कल मिली थी,
जब साँझ अकेली ढली थी,
न कोई साथी, न कोई सहारा,
न कोई अपना, न कोई किनारा।
मेरे संग लता-बल्लरी थी,
हर पत्ती मेरी हमसफ़र बनी थी,
मंद पवन कुछ कहती थी,
मानो मेरी पीड़ा सहती थी।
नयनों में नीर भरा था,
हृदय मगर फिर भी खरा था,
ओठों पर मौन सजा था,
मन में कोई दीप जला था।
मैंने खुद से प्रश्न किया—
“कब तक यूँ ही टूटती रहोगी?”
अंतर से आवाज़ उठी—
“कब तक दूसरों में खुद को खोजोगी?”
जो पीड़ा थी, वही प्रेरणा बनी,
जो ठोकर थी, वही साधना बनी,
जो आँसू थे, वही अभिव्यक्ति बने,
जो बिखरे स्वप्न थे, वही शक्ति बने।
न हाथ किसी का मिला मुझे,
न छाँव किसी की मिली मुझे,
मैंने अपने घाव सँवारे,
अपने ही दीप से रात सँवारे।
कल तक मैं सहारा ढूँढ़ रही थी,
आज स्वयं आधार बनी हूँ,
कल तक मौन खड़ी थी जग में,
आज स्वयं हुंकार बनी हूँ।
जिसे मेरी कमजोरी समझा,
वही मेरी तैयारी थी,
जिसे मेरी चुप्पी समझा,
वह तूफ़ान से पहले की खामोशी थी।
मैं नारी हूँ—निरुपाय नहीं,
मैं नारी हूँ—लाचार नहीं,
मैं टूटूँगी तो निखरूँगी,
मैं झुकूँगी तो उभरूँगी।
कल मैं खुद से मिली थी,
तभी अपनी शक्ति मिली थी,
अब दुनिया चाहे जो कहे—
मैं अपनी पहचान स्वयं लिखूँगी,
क्योंकि मैं कल भी मैं थी…
और आज भी मैं ही हूँ!..
-पूनम कुमारी