रुकी थमी से स्वांस क्यों
यह बे वजह विलाप क्यों
वीर हो प्रताप भी हो तुम
कर वियज की आस कर
की यूँ उठे धमनी का शोर
हर एक दिशा में चारों ओर
ऐसै सिंह सी तू दहाड़ कर
अब तो उठ के प्रहार कर
कर विजय की आस कर
गिरी सा भर भुजा में जोर
सिंधु सा कर हृदय में शोर
कह रही है यह धरा तुझे
कि अब के कुछ विराट कर
कर वियज की आस कर
अब तू उठ के तोड़ डाल
यह बंदियों सी बेड़ियां
इस घनघोर अंधकार मे
तू खुद का शुभप्रभात कर
कर विजय की आस कर
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।