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कर विजय की आस

                
                                                         
                            रुकी थमी से स्वांस क्यों
                                                                 
                            
यह बे वजह विलाप क्यों
वीर हो प्रताप भी हो तुम
कर वियज की आस कर

की यूँ उठे धमनी का शोर
हर एक दिशा में चारों ओर
ऐसै सिंह सी तू दहाड़ कर
अब तो उठ के प्रहार कर
कर विजय की आस कर

गिरी सा भर भुजा में जोर
सिंधु सा कर हृदय में शोर
कह रही है यह धरा तुझे
कि अब के कुछ विराट कर
कर वियज की आस कर

अब तू उठ के तोड़ डाल
यह बंदियों सी बेड़ियां
इस घनघोर अंधकार मे
तू खुद का शुभप्रभात कर
कर विजय की आस कर

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8 वर्ष पहले

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