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हम मजबूर हैं

Parul Bhaktani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रहते थे जिनके दिल में, परछाई से उनकी दूर हैं
        
                                                    
                            
इस हिज्र में साँसे लिए जाने को हम मजबूर हैं

जज़्बात-ओ-एहसासों की ज़ंज़ीरों में अब हैं कैद हम
चाहें न चाहें ज़िन्दगी जीने को भी मा'ज़ूर हैं

चाहा नहीं जिनसे कभी भी दूर रहना हमने था
हम सिर्फ उनके फ़ैसले से ही हुए मा'मूर हैं

इस ज़िन्दगी में क्या मोहब्बत से बड़ा है और कुछ
लेकिन न जाने क्यूँ वो अपनी ही अना में चूर हैं

मायूस दिल की वो सदा भी सुन नहीं पाए कभी
उल्टा हमें ही कहते आए वो कि हम मगरूर हैं
16 घंटे पहले
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