मैं क्यों नहीं समझ पाया,
कि पूर्णता नहीं,
पर्याप्त होना ही
जीवन का सबसे शांत उत्तर है।
मैंने हर उपलब्धि के बाद,
एक और शिखर देखा।
शिखर पर पहुँचकर भी,
क्षितिज शेष रहा।
क्या आकांक्षाएँ
सचमुच बाहर जन्मती हैं?
या वे भीतर बैठी
अपूर्णता की प्रतिध्वनियाँ हैं?
श्वास चलती रही,
और इच्छाएँ भी।
दोनों में केवल इतना अंतर था—
एक जीवन देती रही,
दूसरी जीवन टालती रही।
मैं थका नहीं था शायद,
मैं केवल ठहरा था।
जैसे नदी
अपने ही मोड़ पर
स्वयं को सुनती है।
जिसे मैं विराम समझता रहा,
वह पराजय नहीं थी।
वह भीतर लौटने का
एक मौन निमंत्रण था।
अब लगता है—
अधिक पाने की नहीं,
कम चाहने की साधना
मनुष्य को हल्का करती है।
शायद जीवन का अर्थ
अंतिम उपलब्धि में नहीं,
उस क्षण में है
जब मन कह सके—
जो है, वही पर्याप्त है;
और उसी स्वीकार में
समय भी ठहर जाता है,
मैं भी।