भीतर जो निस्पंद जल है—
क्या वही मैं हूँ,
या मेरे होने का
अब तक अनकहा अर्थ?
मैंने ही अपने चारों ओर
स्वीकृतियों की दीवारें उठाईं;
फिर उन्हें नियति कहती रही।
जिसे सबने मेरी चुप्पी समझा,
वह शायद मेरे अस्तित्व का
सबसे मुखर प्रदेश था।
मैं बोलती नहीं थी—
क्योंकि शब्द मेरे भीतर
अभी जन्म ले रहे थे।
आज कोई बंधन नहीं टूटा;
केवल भ्रम झरा है—
कि स्वयं तक पहुँचने के लिए
किसी और की अनुमति चाहिए।
अब मैं अपने प्रश्नों की शिष्या भी हूँ,
अपनी अनुभूतियों की साक्षी भी।
मेरा मौन पराजय का आवरण नहीं,
स्वयं में लौटती हुई चेतना की दीर्घ प्रतिध्वनि है।