जब भीतर
क्रोध का प्रथम कंपन उठता है,
मैं देखता हूँ—
वह किसी दूसरे से नहीं,
मेरी ही अस्थिर छाया से जन्म लेता है।
और तब
सहनशीलता
एक मौन नदी की तरह
मेरे भीतर बहने लगती है।
अहंकार कभी ऊँची आवाज़ में नहीं आता,
वह प्रायः
तर्कों के वस्त्र पहनकर
चेतना के द्वार पर खड़ा होता है।
किन्तु धैर्य—
वह बिना बोले ही
उसके समस्त शोर को
अर्थहीन कर देता है।
मैंने पाया है,
मनुष्य दूसरों से कम
स्वयं से अधिक लड़ता है।
बाहर के युद्ध
भीतर के विखंडन की प्रतिध्वनियाँ हैं।
जिस दिन
मन स्वयं को स्वीकार लेता है,
उस दिन संसार
अचानक कम शत्रुतापूर्ण प्रतीत होता है।
टकराव
विचारों से नहीं जन्मता,
वह जन्मता है
उन अदृश्य आघातों से
जिन्हें हम वर्षों तक
अपने भीतर दबाए रखते हैं।
और फिर
एक क्षण का क्रोध
समूचे संबंधों को
अंधकार में बदल देता है।
सहनशीलता
पराजय नहीं है;
यह भीतर की उस दीर्घ साधना का नाम है
जहाँ मन
प्रतिक्रिया से पहले
स्वयं को सुनना सीखता है।
जो स्वयं को सुन लेता है,
वह दूसरों को
क्षमा भी कर सकता है।
कितना विचित्र है—
मनुष्य संसार को जीतना चाहता है,
पर अपनी ही व्याकुलता पर
अधिकार नहीं रख पाता।
जबकि समरसता
किसी विजय-ध्वज में नहीं,
अपितु उस मौन में छिपी होती है
जहाँ कोई किसी को
परास्त नहीं करना चाहता।
बिखराव
अचानक नहीं आता;
वह पहले
संवाद की मृत्यु बनकर उतरता है।
शब्द सूख जाते हैं,
और संबंध
अपने ही भीतर
रेगिस्तान बनने लगते हैं।
तभी सहनशीलता
पहली वर्षा की तरह
मनुष्यता को पुनः भिगोती है।
अब मैं जानता हूँ—
जीवन का संतुलन
बाहरी व्यवस्थाओं में नहीं,
अपितु उस आंतरिक दीप में है
जो क्रोध के अंधकार में भी
शांत जलता रहता है।
और शायद
मनुष्य का सबसे बड़ा साध्य यही है—
कि वह संसार बदलने से पूर्व
अपने भीतर के तूफ़ान को
मौन करना सीख ले।