जब सभी उत्तर
चारों ओर बिखरे पड़े थे,
उसी समय भीतर
एक प्रश्न धीरे से जागा—
क्या वास्तव में अपने साथ हूँ?
बहुत दूर तक पगचिह्न खोजे,
पर मार्ग वहीं समाप्त हुआ,
जहाँ भीतर का प्रथम मौन आरंभ हुआ।
तभी लगा—
मार्ग बाहर नहीं,
दृष्टि ही भटकती रही थी।
वृक्ष ने कुछ नहीं कहा।
उसकी स्थिर छाया में जाना—
जो गहन होता है,
स्वयं को सिद्ध नहीं करता।
नदी ने अपने जल का इतिहास नहीं लिखा,
दीप ने अपने प्रकाश का वर्णन नहीं किया।
फिर अपने होने का प्रमाण
क्यों चाहता हूँ?
धीरे-धीरे स्पष्ट हुआ—
प्रश्न बाहर नहीं थे।
अपनी ही प्रतिध्वनियों को
दुनिया का स्वर समझता रहा।
जिसे नियति कहता था,
वह अनसुने मौन का ही विस्तार था।
तभी पहली बार
मौन ने
शब्दों से अधिक स्पष्ट होकर
मुझे पढ़ना आरंभ किया।
अब जानना नहीं चाहता—
क्या मिला।
केवल इतना देखना चाहता हूँ—
मेरे स्पर्श से किस रिक्तता में
एक कंपन जन्मा,
और मेरे मौन से किस अंधकार ने
अपने भीतर प्रकाश का अनुमान किया।
शायद होना
प्राप्ति नहीं,
किसी अदृश्य स्पंदन का
निमित्त बन जाना है।
मनुष्य होना
किसी शिखर पर पहुँचना नहीं,
अपने 'मैं' को इतना निर्मल कर देना है
कि उसमें आकाश भी
स्वयं को सीमित न पाए।
तब भिन्न दिखाई देने वाले सभी रूप
एक ही अदृश्य स्पंदन में
लौट आते हैं—
जहाँ 'मैं' और 'जगत्'
दो शब्द नहीं रहते।
अब अंतिम उत्तर की प्रतीक्षा नहीं।
उत्तर यात्रा को विराम देते हैं,
प्रश्न चेतना को जीवित रखते हैं।
इसलिए लौटता हूँ
उसी प्रथम प्रश्न के पास—
क्या वास्तव में अपने साथ हूँ?
यदि उस प्रश्न के आगे
मौन उतर आए,
तो शायद वहीं से
शब्द समाप्त होते हैं,
और चेतना
अपना प्रथम उच्चारण करती है।