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अँगूठियाँ नहीं जीतीं कलाई हार गए

Nivedan Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बुराइयों से लड़े हम लड़ाई हार गए
        
                                                    
                            
यक़ीन मानिए अब की भलाई हार गए

ख़याल,ख़्वाब,ख़ुशी,ज़िंदगी,बहिश्त,लक़ब
बदन की शर्त पे सारी कमाई हार गए

हकीम कुछ नहीं कर पाए इक बिमारी का
हमारी साँस पे आकर दवाई हार गए

फ़क़ीर नाचता है तालियाँ बजाते हुए
वसीयतों पे यहाँ लोग भाई हार गए

बड़े बुजुर्गों की इक आख़िरी निशानी थी
बहुत अज़ीज़ थी जो चारपाई हार गए

कि एक हिस्से पे दिल का वजूद है अपना
किसी के हुस्न पे हम दो-तिहाई हार गए

ये रास्ते मेरे पाँवों को याद थे इक दिन
गुमान-ए-तीरगी में रहनुमाई हार गए

ये किस तरह की मोहब्बत है आज-कल जिस में
अँगूठियाँ नहीं जीतीं कलाई हार गए

ज़माने भर को सिखाते थे सब कलाबाजी
जो अपने आप पे सारी ख़ुदाई हार गए
3 घंटे पहले
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