आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अँगूठियाँ नहीं जीतीं कलाई हार गए

                
                                                         
                            बुराइयों से लड़े हम लड़ाई हार गए
                                                                 
                            
यक़ीन मानिए अब की भलाई हार गए

ख़याल,ख़्वाब,ख़ुशी,ज़िंदगी,बहिश्त,लक़ब
बदन की शर्त पे सारी कमाई हार गए

हकीम कुछ नहीं कर पाए इक बिमारी का
हमारी साँस पे आकर दवाई हार गए

फ़क़ीर नाचता है तालियाँ बजाते हुए
वसीयतों पे यहाँ लोग भाई हार गए

बड़े बुजुर्गों की इक आख़िरी निशानी थी
बहुत अज़ीज़ थी जो चारपाई हार गए

कि एक हिस्से पे दिल का वजूद है अपना
किसी के हुस्न पे हम दो-तिहाई हार गए

ये रास्ते मेरे पाँवों को याद थे इक दिन
गुमान-ए-तीरगी में रहनुमाई हार गए

ये किस तरह की मोहब्बत है आज-कल जिस में
अँगूठियाँ नहीं जीतीं कलाई हार गए

ज़माने भर को सिखाते थे सब कलाबाजी
जो अपने आप पे सारी ख़ुदाई हार गए
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर