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दंश , विष और जहर

Nag Mani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तक्षक,
        
                                                    
                            
सुना है, लोग कहते हैं
तुम बहुत विशाल थे
परीक्षित को चिरनिद्रा में सुलाया था।

दंश तुम्हारा बहुत तेज था
विषैला कहीं उससे भी ज्यादा!
हाय , फिर भी न था किसी काम का।

वह दंश भी कैसा!
वह विष , वह जहर भी कैसा!
असर दिखलाता जो शीघ्र
दंश तो दंश है जब
विष तो विष है जब
मिलने के बाद दुविधा में हो
न जीने की इच्छा हो
न मौत को नजदीक आने दे
हर स्मरणीत क्षण पल में अहसास हो
दंश की , विष की, जहर की तीक्ष्णता।

तक्षक,
सुना है, लोग कहते हैं
तुम बहुत विशाल थे
परीक्षित को चिरनिद्रा में सुलाया था।
-नाग मणि
5 घंटे पहले
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