तक्षक,
सुना है, लोग कहते हैं
तुम बहुत विशाल थे
परीक्षित को चिरनिद्रा में सुलाया था।
दंश तुम्हारा बहुत तेज था
विषैला कहीं उससे भी ज्यादा!
हाय , फिर भी न था किसी काम का।
वह दंश भी कैसा!
वह विष , वह जहर भी कैसा!
असर दिखलाता जो शीघ्र
दंश तो दंश है जब
विष तो विष है जब
मिलने के बाद दुविधा में हो
न जीने की इच्छा हो
न मौत को नजदीक आने दे
हर स्मरणीत क्षण पल में अहसास हो
दंश की , विष की, जहर की तीक्ष्णता।
तक्षक,
सुना है, लोग कहते हैं
तुम बहुत विशाल थे
परीक्षित को चिरनिद्रा में सुलाया था।
-नाग मणि
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X