एक सच कड़वा होता है।
समाज और हम होते हैं।
परिवार एक सच होता हैं।
छल फरेब स्वार्थ रखते हैं।
एक सच हम न सहते हैं।
बहाने और झूठ कहते हैं।
धन संपत्ति में रिश्ते कहा हैं।
हां ज़रूर यही एक सच हैं।
आज में हम सब जानते हैं।
रात तो यही आखिरी होती हैं।
बस एक सच सोच हमारी है।
कड़वा सच ही एक सच है।
नीरज शब्दों में जो लिखते हैं।
हम सबको एक सच कहते हैं।
हम सब भी यही समझते हैं।
बस यूं ही रिश्ते निभाते हैं।
आओ एक सच सोचते हैं।
-नीरज कुमार अग्रवाल