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दर्द क़यामत का है

MD Shahabuddin

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दर्द क़यामत का है पर इसका जतन भी नहीं कर सकता
        
                                                    
                            
गम भी तेरा गम है इसको कम भी नहीं कर सकता

जनता हूँ तेरे खतो के मायने बदल से गए है
जला तो दू इनको पर दफ़न भी नहीं कर सकता

चाहता है की तराशू तेरे बदन को,अपनी क़लम से
गुल लिख भी दू तो पर गुलबदन भी नहीं कर सकता


मुहम्मद शहाबुद्दीन


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